Monday, 17 September 2018

त्रिफला रसायन





त्रिफला रसायन कल्प त्रिदोषनाशक, इंद्रिय बलवर्धक विशेषतः नेत्रों के लिए हितकर, वृद्धावस्था को रोकने
वाला व मेधाशक्ति बढ़ाने वाला है। इसके सेवन से नेत्रज्योति में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है। दृष्टिमाद्य, रतौंधी,
मोतियाबिंदु, काँचबिंदु आदि नेत्ररोगों से रक्षा होती है। बाल काले,घने व मजबूत बनते हैं। 40 दिन तक
विधियुक्त सेवन करने से स्मृति, बुद्धि, बल व वीर्य में वृद्धि होती है। 60 दिन तक सेवन करने से यह विशेष
प्रभाव दिखाता है। जगजाहिर है कि इस प्रयोग से पूज्य बापू जी अदभुत लाभ हुआ है, चश्मा उतर गया है|


  विधिः--
  शरदपूर्णिमा की रात को चाँदी के पात्र में 350 ग्राम त्रिफला चूर्ण, 350 ग्राम देसी गाय का घी व 175 ग्राम शुद्ध शहद
मिलाकर पात्र को पतले सफेद वस्त्र से ढँक कर रात भर चाँदनी में रखें। दूसरे दिन सुबह इस मिश्रण को काँच अथवा
चीनी के पात्र में भर लें। (उपर्युक्त मात्राएँ 40 दिन के प्रयोग के लिए हैं। 60 दिन के प्रयोग के लिए त्रिफला, घी व शहद
की मात्राएँ डेढ़ गुनी लें।)


 सेवन-विधिः--
   11 ग्राम मिश्रण सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ लें (बालकों के लिए मात्रा 6 ग्राम)
दिन में केवल एक बार सात्त्विक, सुपाच्य भोजन करें। इन दिनों में भोजन में नमक कम
हो तो अच्छा है। साधारण नमक की जगह सेंधा नमक का उपयोग विशेष लाभदायक है।
सुबह शाम गाय का दूध ले सकते हैं। दूध व रसायन के सेवन में दो ढाई घंटे का अंतर
रखना आवश्यक है। कल्प के दिनों में खट्टे, तले हुए, मिर्च-मसालेयुक्त व पचने में भारी
पदार्थों का सेवन निषिद्ध है। इन दिनों में केवल दूध-चावल, दूध-दलिया अथवा दूध-रोटी
का सेवन अधिक गुणकारी है।

   इस प्रयोग के बाद 40 दिन तक मामरा बादाम का उपयोग विशेष लाभदायी होगा।
कल्प के दिनों में नेत्रबिन्दु का प्रयोग अवश्य करें।

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Sunday, 16 September 2018

जैविक घडी आधारित दिन चर्या

हमारे ऋषियों, आयुर्वेदाचार्य ने जो जल्दी सोने-जागने एवं आहार-विहार की बातें बतायी है,उन पर अध्ययन व खोज करके आधुनिक वैज्ञानिक और चिकित्सक अपनी भाषा में उसका पुरजोर समर्थन कर रहे है ।
मनुष्य के शरीर में करीब ६० हजार अरब से एक लाख अरब जितने कोश होते है और हर सेकंड एक अरब रासायनिक क्रियाएँ होती है । उनका नियंत्रण सुनियोजित ढंग से किया जाता है और उचित समय पर हर कार्य का सम्पादन किया जाता है । सचेतन मन के द्वारा शरीर के सभी संस्थानों को नियत समय पर क्रियाशील करने के आदेश मस्तिष्क की पीनियल ग्रन्थि के द्वारा स्रावों (हार्मोन्स) के माध्यम से दिये जाते है । उनमे मेलाटोनिन और सेरोटोनिन मुख्य है, जिनका स्राव दिन-रात के कालचक्र के आधार पर होता है । यदि किसी वजह से इस प्राकृतिक शारीरिक कालचक्र या जैविक घड़ी में विक्षेप होता है तो उसके कारण भयंकर रोग होते है, जिनका इलाज सिर्फ औषोधियों से नहीं हो सकता । और य्स्दी अपनी दिनचर्या, खान-पान तथा नींद को इस कालचक्र के अनुरूप नियमित किया जाय तो इन रोगों से रक्षा होती है और उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है । इस चक्र के विक्षेप से सिरदर्द, सर्दी से लेकर कैंसर जैसे रोग भी हो सकते है । अवसाद, अनिद्रा जैसे मानसिक रोग तथा मूत्र-संस्थान के रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह (diabetes), मोटापा, ह्रदयरोग जैसे शारीरिक रोग भी हो सकते है । उचित भोजनकाल में पर्याप्त भोजन करनेवालों की अपेक्षा अनुचित समय कम भोजन करनेवाले अधिक मोटे होते जाते है और इनमे मधुमेह की सम्भावना बढ़ जाती है । अत: हम क्या खाते है, कैसे सोते है यह जितना महत्त्वपूर्ण है,उतना ही महत्वपूर्ण है हम कब खाते या सोते है ।
अंगों की सक्रियता अनुसार दिनचर्या
प्रात : ३ से ५ :यह ब्रम्हमुहूर्त का समय है । इस समय फेफड़े सर्वाधिक क्रियाशील रहते है । ब्रम्हमुहूर्त में थोडा-सा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना चाहिए । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है । उन्हें शुद्ध वायु (ऑक्सिजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ् व स्फूर्तिमान होता है । ब्रम्हमुहूर्त में उठनेवाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है और सोते रहनेवालों का जीवन निस्तेज हो जाता है ।
प्रात: ५ से ७ : इस समय बड़ी आँत क्रियाशील होती है । जो व्यक्ति इस समय भी सोते रहते है या मल-विसर्जन नहीं करते, उनकी आँते मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती है । इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते है । अत: प्रात: जागरण से लेकर सुभ ७ बजे के बीच मलत्याग कर लेना चाहिए ।
सुबह ७ से ९ व ९ से ११ : ७ से ९ आमाशय की सक्रियता का काल है । इसके बाद ९ से ११ तक अग्न्याशय व प्लीहा सक्रिय रहते है । इस समय पाचक रस अधिक बनाते है । अत: करीब ९ से १ बजे का समय भोजन के लिए उपयुक्त है । भोजन से पहले ‘रं- रं- रं… ‘बीजमंत्र का जप करने से जठराग्नि और भी प्रदीप्त होती है । भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये ।
इस समय अल्पकालिक स्मृति सर्वोच्च स्थिति में होती है तथा एकाग्रता व विचारशक्ति उत्तम होती है । अत: यह तीव्र क्रियाशीलता का समय है । इसमें दिन के महत्त्वपूर्ण कार्यो को प्रधानता है ।
दोपहर ११ से १ : इस समय उर्जा-प्रवाह ह्रदय में विशेष होता है । करुणा, दया, प्रेम आदि ह्रदय की संवेदनाओ को विकसित एवं पोषित करने के लिए दोपहर १२ बजे के आसपास मध्यान्ह-संध्या करने का विधान हमारी संस्कृति में है । हमारी संस्कृति कितनी दीर्घ दृष्टिवाली हैं ।
दोपहर १ से ३ : इस समय छोटी आँत विशेष सक्रिय रहती है । इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर ढकेलना हैं । लगभग इस समय अर्थात भोजन के करीब २ घंटे बाद प्यास-अनुरूप पानी पीना चाहिए, जिससे त्याज्य पदार्थो को आगे बड़ी आँत को सहायता मिल सके । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है ।
दोपहर ३ से ५ : यह मूत्राशय की विशेष सक्रियता का काल है | मूत्र का संग्रहण करना यह मूत्राशय का कार्य है | २ – ४ घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्रत्याग की प्रवृत्ति होगी |
शाम ५ से ७ : इस समय जीवनीशक्ति गुर्दों की एयर विशेष प्रवाहित होने लगती है | सुबह लिए गये भोजन की पाचनक्रिया पूर्ण हो जाती है | अत: इस काल में सायं भुक्त्वा लघु हितं … (अष्टांगसंग्रह)अनुसार हलका भोजन कर लेना चाहिए | शाम को सूर्यास्त से ४० मिनट पहले से १० मिनट बाद तक (संध्याकाल में) भोजन न करें | न संध्ययो: भुत्र्जीत| (सुश्रुत संहिता) संध्याकालों में भोजन नहीं करना चाहिए |
न अति सायं अन्नं अश्नीयात | (अष्टांगसंग्रह)सायंकाल (रात्रिकाल) में बहुत विलम्ब करके भोजन वर्जित है | देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है |
सुबह भोजन के दो घंटे पहले तथा शाम को भोजन के तीन घंटे दूध पी सकते है |
रात्रि ७ से ९ : इस समय मस्तिष्क विशेष सक्रिय रहता है | अत: प्रात:काल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है | आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टि हुई है | शाम को दीप जलाकर दीपज्योति: परं ब्रम्हा….. आणि स्त्रोत्र्पाथ व शयन से पूर्व स्वाध्याय अपनी संस्कृति का अभिन्न अंग है |
रात्रि ९ से ११ : इस समय जीवनीशक्ति रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु (spinal cord) में विशेष केंदित होती है | इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरुरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है |इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है और जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है |
रात्रि ९ बजने के बाद पाचन संस्थान के अवयव विश्रांति प्राप्त करते है, अत: यदि इस समय भोजन किया जाय तो वाह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं है और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते है जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने रोग उत्पन्न करते है | इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है |
रात्रि ११ से १ : इस समय जीवनीशक्ति पित्ताशय में सक्रिय होती है | पित्त का संग्रहण पित्ताशय का मुख्य कार्य है | इस समय का जागरण पित्त को प्रकुपित कर अनिद्रा, सिरदर्द आदि पित्त-विकार तथा नेत्र्रोगों को उत्पन्न करता है |
रात्रि को १२ बजने के बाद दिन में किये गये भोजन द्वारा शरीर के क्षतिग्रस्त कोशी के बदले में नये कोशों का निर्माण होता है | इस समय जागते रहोगे तो बुढ़ापा जल्दी आयेगा |
रात्रि १ से ३ : इस समय जीवनीशक्ति यकृत (liver) में कार्यरत होती है | अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है | इस समय शरीर को गहरी नींद की जरूरत होती है |इसकी पूर्ति न होने पर पाचनतंत्र बिगड़ता है |
इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएँ मंद होती है | अत: इस समय सडक दुर्घटनायें अधिक होती है |
निम्न बातों का भी विशेष ध्यान रखें :
१) ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है |अत: प्रात: एवं शाम के भोज की मात्रा ऐसी रखें, जिससे ऊपर बताये समय में खुलकर भूख लगे |
२) सुबह व शाम के भोजन के बीच बार-बार कुछ खाते रहने से मोटापा, मधुमेह,ह्रदयरोग जैसी बिमारियों और मानसिक तनाव व अवसाद (mental stress & depression) आदि का खतरा बढ़ता है |
३) जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें | इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है | कुर्सी पर बैठकर भोजन करने से पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल नहीवत हो जाती है | इसलिए ‘बुफे डिनर’ से बचना चाहिए |
४) भोजन से पूर्व प्रार्थना करें, मंत्र बोले या गीता के पंद्रहवे अध्याय का पाठ करें | इससे भोजन भगवतप्रसाद बन जाता है | मंत्र :
हरिर्दाता हरिर्भोक्ता हरिरन्नं प्रजापति: |
हरि: सर्वशरीरस्थो भुंक्ते भोजयते हरि: ||
५) भोजन के तुरंत बाद पानी न पिये, अन्यथा जठराग्नि मंद पद जाती है और पाचन थी से नहीं हो पाता | अत: डेढ़-दो घंटे बाद ही पानी पिये | फ्रिज का ठंडा पानी कभी न पिये |
६) पानी हमेशा बैठकर तथा घूँट-घूँट करके मुँह में घुमा-घुमा के पिये | इससे अधिक मात्रा में लार पेट में जाती है, जो पेट के अम्ल के साथ संतुलन बनाकर दर्द, चक्कर आना, सुबह का सिरदर्द आदि तकलीफें दूर करती है |
७) भोजन के बाद १० मिनट वज्रासन में बैठे | इससे भोजन जल्दी पचता है |
८) पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोये;अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती है |
९) शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्री को बत्ती बंद करके सोये | इस संदर्भ में हुये शोष चौकानेवाले है | नॉर्थ कैरोलिना युनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. अजीज के अनुसार देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-सबंधी हानियाँ होती है | अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी सही ढंग से चलती है |
आजकल पाये जानेवाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है | हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगो की सक्रियता का हमे अनायास ही लाभ मिलेगा | इस प्रकार थोड़ी-सी सजगता हमें स्वस्थ जीवन की प्राप्ति करा देगी |

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शरद ऋतुचर्या



वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु आती है। शरद में चंद्रमा का बल अव्याहत् (पूर्ण) हो जाता है जिससे भूतलगत पदार्थों में स्नेह व लवणरस की वृद्धि होती है। बल भी बढ़ता है। औषधियाँ पुष्ट होने लगती हैं।

    वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से संचित पित्तदोष का शरद ऋतु में प्रकोप हो जाता है। वायु का शमन होता है।    जठराग्नि मंद हो जाती है। परिणामस्वरूप रोग उत्पन्न होते हैं। आयुर्वद ने समस्त ऋतुओं में शरद ऋतु को रोगों की माता कहा जाता है।

    आहारः पित्त के शमन के लिए मीठे, कड़वे एवं तूरे रस का उपयोग विशेष रूप से करना चाहिए। अनाज में गेहूँ, जौ, ज्वार, चावल, दालों में मूँग, मसूर, मोठ, सब्जियों में कुम्हड़ा (पेठा), लौकी, करेले, परवल, तोरई, गिल्की, गोभी, कंकोड़ा, पालक, चौलाई, गाजर, कच्ची ककड़ी, मक्के का भुट्टा, फलों में अनार, जामन पके केले, जामफल, मोसम्बी, नींबू, नारियल, ताजा अंजीर, पका पपीता, अंगूर, सूखे मेवों में चारोली, पिस्ता तथा मसालों में जीरा, धनिया, आँवला, इलायची, हल्दी, खसखस, सौंफ लिये जा सकते हैं।

     इसके अलावा दूध, घी, मक्खन, मिश्री, नारियल का तेल तथा अरण्डी का तेल लेना बहुत लाभदायी है। तेल की जगह घी का उपयोग उत्तम है।

     शरद ऋतु में खीर, रबड़ी आदि ठंडी करके खाना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है।
पके केले में घी और इलायची डालकर खाने से लाभ होता है। गन्ने का रस एवं नारियल का पानी खूब फायदेमंद हैं। काली द्राक्ष (मुनक्का), सौंफ एवं धनिया मिलाकर बनाया गया पेय गर्मी का शमन करता है।
इस ऋतु में पित्तदोष का प्रकोप करने वाली खट्टी व तीखी वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। भरपेट भोजन, दिन की निद्रा, बर्फ, दही, खट्टी छाछ व तले हुए पदार्थों का सेवन न करें। जीरा, धनिया, सौंफ, मिश्री मिलायी हुई ताजी छाछ ले सकते हैं।

     बाजरा, उड़द, कुलथी, अरहर (तुअर) चौलाई, मिर्च, प्याज, लहसुन, अदरक, पके हुए बैंगन, टमाटर, इमली, हींग, तिल, मूँगफली, सरसों आदि पित्तकारक होने से त्याज्य है।

     विशेषः अगर पित्तविकार हो तो पित्त के शमनार्थ आँवला चूर्ण अथवा त्रिफला चूर्ण लेना चाहिए। आँवला और मिश्री के चूर्ण तथा चाँदनी में रखा गया गुलकन्द शरद ऋतु में अत्यन्त लाभदायी है। यह बढ़ हुए पित्त को मल के साथ बाहर निकालकर शीतलता, ताजगी, स्फूर्ति व बल प्रदान करता है। शरद पूर्णिमा के बाद पुष्ट हुए ताजे आँवलों से बनाया गया संत च्यवनप्राश भी पित्त के शमन तथा रोगप्रतिकारक शक्ति को बढ़ाने के लिए श्रेष्ठ औषधि है।

     बुखार, पेचिस, उल्टी, दस्त, मलेरिया आदि ऋतुजन्य विकारों से बचने के लिए अन्य दवाइयों पर खर्चा करने की अपेक्षा आँवला, धनिया और सौंफ के समभाग मिश्रण में उतनी ही मिश्री मिलाकर एक चम्मच चूर्ण पानी के साथ लेना हितकर है।

    इस ऋतु में जुलाब लेने से शरीर से पित्तदोष निकल जाता है एवं पित्तजन्य विकारों से रक्षा होती है। जुलाब के लिए हरीत की (हरड़) उत्तम औषधि है। शरद ऋतु में दो ग्राम हरड़ चूर्ण में समभाग मिश्री मिलाकर 3 से 4 ग्राम मिश्रण सुबह खाली पेट लेना चाहिए।

    भाद्रपद माह में कड़वे पदार्थ विशेष लाभदायी है। कड़वा रस पित्तशामक एवं ज्वर-प्रतिरोधी है। अतः चिरायता, नीम के पत्ते, करेले आदि का सेवन करना चाहिए।

    श्राद्ध के दिनों में एवं नवरात्रि में पितृजन हेतु कड़क ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। यौवन सुरक्षा पुस्तक का पाठ करना चाहिए। यौवन सुरक्षा पुस्तक का पाठ करने से ब्रह्मचर्य में मदद मिलेगी।

    विहारः    इन दिनों में शीतल चाँदनी का लाभ लेने के लिए रात्रिजागरण, रात्रिभ्रमण करना चाहिए। इसीलिए नवरात्रि वगैरह का आयोजन किया जाता है। रात्रिजागरण 12 बजे तक का ही माना जाता है। अधिक जागरण से, सुबह एवं दोपहर को सोने से त्रिदोष प्रकुपित होते हैं जिससे स्वास्थ्य बिगड़ता है।

    हमारे दूरदर्शी ऋषि-मुनियों ने शरदपूनम जैसा त्यौहार भी इस ऋतु में विशेषकर स्वास्थ्य की दृष्टि से ही आयोजित किया है। शरदपूनम की रात को जागरण, भ्रमण, मनोरंजन आदि को उत्तम पित्तनाशक विहार के रूप में आयुर्वेद ने स्वीकार किया है।


    शरदपूनम की शीतल रात्रि में चंद्रमा की किरणों में छत पर रखी हुई दूध की खीर खाना चाहिए | और एकादशी से शरदपूनम तक चन्द्रमा पर त्राटक (एक तक देखना) करने से आखों की रौशनी बढती है ||

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ref: Arogyanidhi book


वर्षा ऋतुचर्या



ग्रीष्म ऋतु के अंत में उत्तरायण समाप्त हो जाता है और सूर्य दक्षिण दिशा की ओर गमन करने लगता है। उत्तरायण में रूक्ष वायु तथा सूर्य की प्रखर किरणों से दुर्बल बन शरीर को दक्षिणायन में धीरे-धीरे बल प्राप्त होने लगता है।
वर्षा ऋतु में भूमि से वाष्प निकलने तथा आकाश से जल बरसने के कारण हवा में आर्द्रता (नमी) रहती है। यह आर्द्रता श्वासोच्छवास के द्वारा शरीर में प्रवेश कर जठराग्नि को मंद कर देती है।
ग्रीष्म ऋतु में संचित हुई वायु वर्षा ऋतु की शीत जलवायु के कारण प्रकुपित हो जाती है व जल में अम्लरस की वृद्धि होने से पित्त का संचय होने लगता है।
आहारः वायु और वर्षा से युक्त विशेष शीतवाले दिनों में भोजन में खट्टे, नमकीन व स्निग्ध पदार्थों की प्रधानता होनी चाहिए। बाहर की नमीयुक्त हवा का प्रतिकार करने के लिए शरीर तीखे-नमकीन पदार्थों की माँग करता है। इसकी पूर्ति पकौड़े-भुजिया आदि का अल्प मात्रा में सेवन कर की जा सकती है। इन दिनों में लहसुन, अदरक, सोंठ, काली मिर्च, हरी मिर्च, अजवायन, हींग आदि तीखे पदार्थों का सेवन करना चाहिए। इससे शरीर की नमी कम करने में तथा जठराग्नि प्रज्वलित रखने में मदद मिलती है।
अनाज में पुराने जौ, गेहूँ और चावल, सब्जियों में सहिजन (सरगवा),कोमल मूली, पेठा, कोमल बैंगन, शलगम, सूरन, परवल, लौकी, हफ्ते में एक दिन करेला, पुनर्नवा (गदहपूर्ना), दालों में कुल्थी, मूँग, तेलों में तिल का तेल सेवनीय है। सब्जियों में आलू, गोभी, ग्वारफली, भिंडी, दालों में अरहर (तुअर), उड़द, राजमा, चना तथा पचने में भारी पदार्थ, सूखा मेवा, मिठाई त्याज्य हैं।
श्रावण मास में दूध व हरी सब्जियाँ तथा भाद्रपद में छाछ व लौकी का सेवन नहीं करना चाहिए।
विहारः इन दिनों में मच्छरों के काटने पर उत्पन्न मलेरिया आदि रोगों से बचने के लिए शरीर की साफ-सफाई का भी ध्यान रखें।
दिन में सोना, नदियों में स्नान करना व बारिश में भीगना व ओस में सोना हानिकारक है।
इस ऋतु में गोमूत्र के पान, मुलतानी मिट्टी से स्नान, घर तथा आस-पास के परिसर में धूप करने, गोबरअथवा गोमूत्र से भूमि को स्वच्छ व पवित्र रखने तथा परंपरागत व्रत उपवास रखने से व यज्ञ-याग, जप आदि करने से स्वास्थ्य-लाभ के साथ-साथ महान धर्म लाभ भी होता है।
विशेषः मंद जठराग्नि, प्रकुपित वायु तथा शारीरिक बल की अल्पता इस ऋतु में अनेक व्याधियों को आमंत्रित करती है। संधिवात, दमा, खाँसी जैसे वातजन्य रोग जोर पकड़ने लगते हैं। दूषित जल तथा हवा से हैजा, मलेरिया जैसी संक्रामक व्याधियाँ फैलने लगती हैं।
इनसे रक्षा करने तथा जठराग्नि को प्रज्वलित रखने हेतु कुछ उपाय यहाँ दिये जा रहे हैं।
सुरक्षा-उपायः जठराग्नि की रक्षा के लिए सबसे प्रथम उपचार है उपवास। अपनी संस्कृति में श्रावण तथा भाद्रपद महीनों में अधिकाधिक व्रत तथा उपवासों का जो विधान है उसके पीछे धार्मिक लाभ के साथ-साथ स्वास्थ्य रक्षण प्रधान हेतु है। मंद गति से कार्य करने वाले पाचन-संस्थान पर अन्न का अधिक बार डालकर रोगों को आमंत्रित करने की अपेक्षा हलका, सुपाच्य भोजन लेना व उपवास रखना बुद्धिमानी है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार सप्ताह में कम से कम एक दो दिन उपवास अवश्य रखना चाहिए। श्रावण महीने में किसी एक अनाज (जैसे केवल मूँग) पर रहना भी उपवास माना जाता है। इन दिनों में अनाज को पहले सेंककर बाद में उपयोग करना भी लाभदायी है। इससे वह पचने में हलका हो जाता है।
वर्षा ऋतु में शहद का सेवन अत्यन्त हितकर है। अदरक, लहसुन व नींबू का सेवन वर्षा ऋतु में विशेष लाभदायी है। खासकर नींबू वर्षाजन्य बीमारियों को दूर करता है।
इन दिनों में पानी उबालकर पीयें। पानी में सोंठ, नागरमोथ, जीरा अथवा धनिया डालकर उबालने से वह विशेष हितकर होता है।

वर्षाकाल में रसायन के रूप में बड़ी हरड़ का चूर्ण में सेन्धा नमक मिलाकर ताजे जल के साथ सेवन करना चाहिए।



ref: arogyanidhi book
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