ग्रीष्म ऋतु के अंत में उत्तरायण समाप्त हो जाता है और सूर्य दक्षिण दिशा की ओर गमन करने लगता है। उत्तरायण में रूक्ष वायु तथा सूर्य की प्रखर किरणों से दुर्बल बन शरीर को दक्षिणायन में धीरे-धीरे बल प्राप्त होने लगता है।
वर्षा ऋतु में भूमि से वाष्प निकलने तथा आकाश से जल बरसने के कारण हवा में आर्द्रता (नमी) रहती है। यह आर्द्रता श्वासोच्छवास के द्वारा शरीर में प्रवेश कर जठराग्नि को मंद कर देती है।
ग्रीष्म ऋतु में संचित हुई वायु वर्षा ऋतु की शीत जलवायु के कारण प्रकुपित हो जाती है व जल में अम्लरस की वृद्धि होने से पित्त का संचय होने लगता है।
आहारः वायु और वर्षा से युक्त विशेष शीतवाले दिनों में भोजन में खट्टे, नमकीन व स्निग्ध पदार्थों की प्रधानता होनी चाहिए। बाहर की नमीयुक्त हवा का प्रतिकार करने के लिए शरीर तीखे-नमकीन पदार्थों की माँग करता है। इसकी पूर्ति पकौड़े-भुजिया आदि का अल्प मात्रा में सेवन कर की जा सकती है। इन दिनों में लहसुन, अदरक, सोंठ, काली मिर्च, हरी मिर्च, अजवायन, हींग आदि तीखे पदार्थों का सेवन करना चाहिए। इससे शरीर की नमी कम करने में तथा जठराग्नि प्रज्वलित रखने में मदद मिलती है।
अनाज में पुराने जौ, गेहूँ और चावल, सब्जियों में सहिजन (सरगवा),कोमल मूली, पेठा, कोमल बैंगन, शलगम, सूरन, परवल, लौकी, हफ्ते में एक दिन करेला, पुनर्नवा (गदहपूर्ना), दालों में कुल्थी, मूँग, तेलों में तिल का तेल सेवनीय है। सब्जियों में आलू, गोभी, ग्वारफली, भिंडी, दालों में अरहर (तुअर), उड़द, राजमा, चना तथा पचने में भारी पदार्थ, सूखा मेवा, मिठाई त्याज्य हैं।
श्रावण मास में दूध व हरी सब्जियाँ तथा भाद्रपद में छाछ व लौकी का सेवन नहीं करना चाहिए।
विहारः इन दिनों में मच्छरों के काटने पर उत्पन्न मलेरिया आदि रोगों से बचने के लिए शरीर की साफ-सफाई का भी ध्यान रखें।
दिन में सोना, नदियों में स्नान करना व बारिश में भीगना व ओस में सोना हानिकारक है।
इस ऋतु में गोमूत्र के पान, मुलतानी मिट्टी से स्नान, घर तथा आस-पास के परिसर में धूप करने, गोबरअथवा गोमूत्र से भूमि को स्वच्छ व पवित्र रखने तथा परंपरागत व्रत उपवास रखने से व यज्ञ-याग, जप आदि करने से स्वास्थ्य-लाभ के साथ-साथ महान धर्म लाभ भी होता है।
विशेषः मंद जठराग्नि, प्रकुपित वायु तथा शारीरिक बल की अल्पता इस ऋतु में अनेक व्याधियों को आमंत्रित करती है। संधिवात, दमा, खाँसी जैसे वातजन्य रोग जोर पकड़ने लगते हैं। दूषित जल तथा हवा से हैजा, मलेरिया जैसी संक्रामक व्याधियाँ फैलने लगती हैं।
इनसे रक्षा करने तथा जठराग्नि को प्रज्वलित रखने हेतु कुछ उपाय यहाँ दिये जा रहे हैं।
सुरक्षा-उपायः जठराग्नि की रक्षा के लिए सबसे प्रथम उपचार है उपवास। अपनी संस्कृति में श्रावण तथा भाद्रपद महीनों में अधिकाधिक व्रत तथा उपवासों का जो विधान है उसके पीछे धार्मिक लाभ के साथ-साथ स्वास्थ्य रक्षण प्रधान हेतु है। मंद गति से कार्य करने वाले पाचन-संस्थान पर अन्न का अधिक बार डालकर रोगों को आमंत्रित करने की अपेक्षा हलका, सुपाच्य भोजन लेना व उपवास रखना बुद्धिमानी है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार सप्ताह में कम से कम एक दो दिन उपवास अवश्य रखना चाहिए। श्रावण महीने में किसी एक अनाज (जैसे केवल मूँग) पर रहना भी उपवास माना जाता है। इन दिनों में अनाज को पहले सेंककर बाद में उपयोग करना भी लाभदायी है। इससे वह पचने में हलका हो जाता है।
वर्षा ऋतु में शहद का सेवन अत्यन्त हितकर है। अदरक, लहसुन व नींबू का सेवन वर्षा ऋतु में विशेष लाभदायी है। खासकर नींबू वर्षाजन्य बीमारियों को दूर करता है।
इन दिनों में पानी उबालकर पीयें। पानी में सोंठ, नागरमोथ, जीरा अथवा धनिया डालकर उबालने से वह विशेष हितकर होता है।
वर्षाकाल में रसायन के रूप में बड़ी हरड़ का चूर्ण में सेन्धा नमक मिलाकर ताजे जल के साथ सेवन करना चाहिए।
ref: arogyanidhi book
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